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ग्लेशियर पिघलना बना बड़ा खतरा
हिंदूकुश हिमालय में ग्लेशियर पिघलने की रफ्तार दोगुनी, 200 करोड़ लोगों पर जल संकट और प्राकृतिक आपदाओं का खतरा
22 Mar 2026, 02:43 PM Central Region - Kathmandu
Reporter : Mahesh Sharma
Kathmandu

हिंदूकुश हिमालय में बढ़ता जलवायु संकट

हिंदूकुश हिमालय क्षेत्र में ग्लेशियर तेजी से पिघल रहे हैं, जो वैश्विक जलवायु परिवर्तन की गंभीरता को दर्शाता है। हालिया रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2000 के बाद से यहां ग्लेशियर पिघलने की गति दोगुनी हो गई है। यह क्षेत्र दुनिया का तीसरा ध्रुव माना जाता है, क्योंकि यहां ध्रुवों के बाद सबसे अधिक बर्फ जमा है। इसी कारण यह क्षेत्र एशिया के कई देशों के लिए जल का प्रमुख स्रोत है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि यह रफ्तार इसी तरह बनी रही, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और गंभीर हो सकती है।

करोड़ों लोगों की जिंदगी पर सीधा असर

इस क्षेत्र से निकलने वाली नदियां, जैसे गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु, करोड़ों लोगों के जीवन का आधार हैं। इन नदियों पर निर्भर आबादी की संख्या लगभग 200 करोड़ बताई जाती है। ग्लेशियर के पिघलने से शुरुआत में जल स्तर बढ़ सकता है, लेकिन लंबे समय में यह जल स्रोतों के खत्म होने का कारण बन सकता है। इससे कृषि, पेयजल और ऊर्जा उत्पादन पर भी गहरा असर पड़ने की आशंका है।

ग्लेशियर झीलों से बढ़ता खतरा

ग्लेशियर के तेजी से पिघलने के कारण बड़ी संख्या में ग्लेशियल झीलें बन रही हैं। ये झीलें अस्थिर होती हैं और कभी भी फट सकती हैं, जिससे अचानक बाढ़ आ सकती है। इस घटना को ग्लेशियर लेक आउटबर्स्ट फ्लड (GLOF) कहा जाता है। ऐसे हादसों से न केवल जान-माल का नुकसान होता है, बल्कि पूरे इलाके की संरचना भी प्रभावित होती है। पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों के लिए यह खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है।

तीन दशकों में तेजी से घटा ग्लेशियर क्षेत्र

रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 30 वर्षों में ग्लेशियर क्षेत्र में भारी कमी दर्ज की गई है। 1990 से 2020 के बीच ग्लेशियरों का तेजी से सिकुड़ना वैज्ञानिकों के लिए चिंता का विषय बन गया है। इस क्षेत्र में हजारों ग्लेशियर फैले हुए हैं, लेकिन उनका आकार लगातार घटता जा रहा है। यह बदलाव केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर आर्थिक और सामाजिक स्तर पर भी पड़ रहा है।

भविष्य को लेकर वैज्ञानिकों की चेतावनी

वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित नहीं किया गया, तो सदी के अंत तक इस क्षेत्र के अधिकांश ग्लेशियर समाप्त हो सकते हैं। इससे जल संकट, बाढ़ और भूस्खलन जैसी समस्याएं और बढ़ सकती हैं। यह रिपोर्ट एक चेतावनी के रूप में सामने आई है, जो बताती है कि समय रहते ठोस कदम उठाना बेहद जरूरी है, वरना इसके परिणाम बेहद गंभीर हो सकते हैं।

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