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होर्मुज टोल पर वैश्विक विवाद बढ़ा
होर्मुज स्ट्रेट पर ईरान की टोल मांग पर विवाद, अंतरराष्ट्रीय कानून से टकराव, स्वेज नहर से तुलना पर उठे सवाल
01 Apr 2026, 03:45 PM -
Reporter : Mahesh Sharma

होर्मुज स्ट्रेट पर टोल को लेकर विवाद

दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्गों में से एक Strait of Hormuz इन दिनों वैश्विक बहस का केंद्र बना हुआ है। ईरान ने इस रास्ते से गुजरने वाले जहाजों पर टोल वसूलने की बात कही है, जिससे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विवाद खड़ा हो गया है। यह मार्ग खाड़ी देशों से निकलने वाले तेल का प्रमुख रास्ता है, जहां से हर दिन बड़ी मात्रा में कच्चा तेल दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में भेजा जाता है। ऐसे में यहां किसी भी तरह की नई शर्त या शुल्क का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है।


ईरान ने खुद को बताया गेटकीपर

ईरान का कहना है कि होर्मुज स्ट्रेट उसके नियंत्रण क्षेत्र में आता है और इसलिए उसे यहां से गुजरने वाले जहाजों पर निगरानी और शुल्क लगाने का अधिकार है। इसके तहत जहाजों की जांच Islamic Revolutionary Guard Corps (IRGC) द्वारा की जाएगी और इसके बाद ही उन्हें आगे बढ़ने की अनुमति दी जाएगी। ईरान का तर्क है कि सुरक्षा और निगरानी की जिम्मेदारी उठाने के बदले यह शुल्क उचित है।


अंतरराष्ट्रीय कानून क्या कहता है

समुद्री कानून के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों पर सभी देशों के जहाजों को बिना किसी बाधा के गुजरने का अधिकार होता है। United Nations के तहत बने नियमों में यह स्पष्ट किया गया है कि ऐसे स्ट्रेट्स पर ‘ट्रांजिट पैसेज’ का अधिकार लागू होता है। विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज जैसे प्राकृतिक जलमार्ग पर टोल वसूली अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ हो सकती है, क्योंकि यह सभी देशों के लिए खुला मार्ग माना जाता है।


स्वेज नहर से तुलना क्यों अलग

ईरान के इस कदम की तुलना अक्सर Suez Canal से की जा रही है, लेकिन दोनों में बड़ा अंतर है। स्वेज नहर एक मानव-निर्मित जलमार्ग है, जिसे बनाने और बनाए रखने में भारी लागत आती है। इसलिए वहां से गुजरने वाले जहाजों से शुल्क लिया जाता है। जबकि होर्मुज स्ट्रेट एक प्राकृतिक समुद्री मार्ग है, जिस पर इस तरह का टोल लागू करना अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार उचित नहीं माना जाता।


वैश्विक व्यापार पर पड़ सकता है असर

यदि ईरान अपने फैसले पर कायम रहता है, तो इसका असर वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ सकता है। तेल की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है और कई देशों के लिए आयात महंगा हो जाएगा। खासकर उन देशों पर इसका ज्यादा असर पड़ेगा, जो खाड़ी क्षेत्र से तेल पर निर्भर हैं। इस वजह से अंतरराष्ट्रीय समुदाय इस मुद्दे को गंभीरता से देख रहा है और समाधान की कोशिशें तेज हो सकती हैं।


आगे क्या हो सकता है समाधान

विशेषज्ञों का मानना है कि इस विवाद का समाधान कूटनीतिक बातचीत और अंतरराष्ट्रीय नियमों के पालन से ही संभव है। अगर ईरान और अन्य देश आपसी सहमति से कोई रास्ता निकालते हैं, तो वैश्विक स्तर पर तनाव कम हो सकता है। फिलहाल, यह मुद्दा केवल एक देश तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव पूरी दुनिया पर पड़ सकता है। ऐसे में सभी पक्षों को संतुलन और समझदारी के साथ आगे बढ़ना होगा।

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